Wednesday, 27 March, 2019
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महाराष्ट्र के गौ-सेवक शब्बीर मामू को पद्मश्री

पिता के कत्लखाने में गायों को कटते देख शब्बीर बना गौ-पालक, सरकार ने दिया पद्मश्री

न्यूजवेव बीड

महाराष्ट्र के छोटे से कस्बे में रहने वाले शेख शब्बीर मामू उस समय अचानक सेलिब्रिटी बन गए जब गणतंत्र दिवस पर उनका नाम गौसेवा के लिये पद्मश्री पुरस्कार के लिये चुना गया। शब्बीर यह भी जानते हैं कि उन्हें कौन-सा पुरस्कार मिला है। वे बिना किसी मेहताने के अनवरत गौ-सेवा करते रहे। उनके बेटे और बहुएं भी गौसेवा में जुटी हैं।

गौवंश को बचाने का काम वे पिछले 50 वर्षों से कर रहे हैं। अपनी 40 एकड़ कृषि भूमि पर वे कोई खेतीबाड़ी नहीं करते सिर्फ चारा उगाते हैं और उससे गौवंश का पालन-पोषण करते हैं।

10 साल की उम्र में गाय कटते देखी थी
शेख शब्बीर बताते हैं कि गांव में उनके पिता का कत्लखाना था। 10 साल की उम्र में उन्होंने गायों को कटते हुए देखा था। इस वीभत्स घटना का उनके दिल पर गहरा असर हुआ। किसी प्राणी को ऐसे तड़पते हुए मरता देख उनको नागवार गुजरा। उन्होंने पिता से कत्तलखाना बंद करवाया और खुद 10 गायें लेकर आए। उनका पालन-पोषण करने लगे। 50 सालों में उनके पास 176 गाय और बैल हैं जिनको वह खुद पालते हैं। गोवंश को खिलाने के लिए अपनी पुश्तैनी 40 एकड़ जमीन पर चारा उगाते हैं।शेख शब्बीर मामू के नाम से इलाके में पहचाने जाते हैं। जब किसी गाय को बच्चा होता है तो उसका पालन पोषण शब्बीर मामू ही करते हैं।

गोबर बेचकर घर चलाते हैं
शब्बीर मामू इन गायों का गोबर बेचकर अपना घर चलाते हैं। इससे उन्हें सालाना 60 से 70 हजार रुपये मिलते हैं। किसी बैल को बेचने की नौबत आने पर वह खरीददार से यह लिखकर लेते हैं कि अगर बैल बीमार हो या काम करने लायक नहीं रहे तो वह वापस उनके पास लाएंगे। उसकी जितनी कीमत होगी, वह चुका दी जाएगी लेकिन उसे कत्लखाने में ना भेजा जाए।
आज शब्बीर मामू के पास 175 से भी जादा मवेशी हैं. जिनका पालन पोषण बडा काम है. लेकिन गौ-सेवा का व्रत लेने वाले शब्बीर मामू का कहना है कि जहां चाह वहां राह। कई लोगों ने उनके मदद की है. कई लोगों ने उनका हौसला बढाया है।

मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करते
जब सरकारी महकमा पद्मश्री मिलने की खबर लेकर उनके पास पहुंचा तब वह तबेले में थे। मोबाइल इस्तेमाल नहीं करते इसलिये उनके आने तक इंतजार करना पडा। शब्बीर कहते हैं कि कौन-सा अवार्ड मिला है यह पता नहीं। न ही मैंने कभी किसी अवार्ड के लिए काम किया था।

गौ-सेवा में ही सुकून
शब्बीर की अगली पीढ़ी यानी उनके दो बच्चे और बहुएं भी अब उनका हाथ बटाते हैं। वह भी शब्बीर के राह पर ही चल रहे हैं। शब्बीर के बेटे कहते है कि किसी भी प्राणी की सेवा बहुत पुण्य का काम है हमने पिता से यह सीखा है कि गौ-सेवा में ही सुकून है। हम पिता का यह काम आगे इसी तरह जारी रखेंगे।

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