Saturday, 23 January, 2021

आईआईटी,बॉम्बे कोविड-19 से बचाव के लिये ‘नसल जैल’ तैयार करेगा

आईआईटी बॉम्बे की टीम ऐसी जैल विकसित करेगी जिसे नाक में लगाने से कोरोना वायरस के प्रवेश को रोका जा सकता है।
न्यूजवेव@ नई दिल्ली
नोवेल कोरोना वायरस को निष्क्रिय करने वाली तकनीक जल्द ही भारत में विकसित कर ली जायेगी। आईआईटी बॉम्बे में डीबीबी विभाग के विशेषज्ञ इस पर अनुसंधान कर रहे हैं।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत साइंस एवं इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड (SERB) ने नोवेल कोरोना वायरस को निष्क्रिय करने वाली तकनीक बनाने के लिए आईआईटी बॉम्बे के जैव विज्ञान और जैव इंजीनियरिंग विभाग (DBB) को वित्तीय मदद के लिये स्वीकृति दे दी है।

आईआईटी बॉम्बे में DBB विभाग की टीम ऐसी जैल विकसित करेगा, जिसे नाक की नली में लगाने से कोरोना वायरस को शरीर में प्रवेश करने से रोका जा सकता है। इस अनुसंधान से न सिर्फ डॉक्टर्स व स्वास्थ्य कर्मचारियों को सुरक्षा मिलेगी बल्कि कोविड-19 के सामुदायिक प्रसार में भी कमी आ सकती है। इससे बीमारी पर तेजी से नियंत्रण करने में सहायता मिलेगी।कोविड-19 के संक्रामक फैलाव को देखते हुये डॉक्टर्स, नर्सिंग व पैरा मेडिकल स्टाफ के सामने कोविड-19 रोगियों की जांच व देखरेख करते समय सर्वाधिक जोखिम रहती है। खासतौर से संक्रामक रोगी को स्पर्श करने से ही बीमारी के फैलने का अंदेशा बना रहता है।
दो चरणों वाली रणनीति बनाई
आईआईटी, बॉम्बे की टीम कोविड-19 के प्रमुख एजेंट सार्स-कोव-2 वायरस के सीमित प्रसार की दो चरणों वाली रणनीति पर काम कर रही है। कोरोना वायरस सबसे पहले फेफड़े की कोशिकाओं में अपनी प्रतिकृतियां पैदा करता रहता है, इसलिए रणनीति के पहले चरण में वायरस को मेजबान कोशिकाओं के साथ जुड़ने से रोकना होगा। इससे मेजबान कोशिकाओं का संक्रमण घटने का अनुमान है, लेकिन फिर भी वायरस सक्रिय बना रहेगा। इसलिए उन्हें निष्क्रिय करने की जरूरत होगी। दूसरे चरण में जैविक अणु शामिल किए जाएंगे, जिससे डिटर्जेंट की तरह वायरसों को फंसाकर निष्क्रिय किया जाएगा। इसके पूरा होने के बाद एक नसल जेल विकसित किया जाएगा जो नाक के छिद्र में लगाया जा सकेगा।
डीएसटी सचिव आशुतोष शर्मा ने कहा कि कोरोना वायरस के खिलाफ लडाई लड़ रहे हमारे चिकित्सक व स्वास्थ्य कर्मचारी भी 200 प्रतिशत सुरक्षा के हकदार हैं। नसल जेल को विशेष सुरक्षा उपायों के साथ विकसित किया जा रहा है, जिससे उन्हें सुरक्षा की अतिरिक्त परत मिलेगी।
डीबीबी, आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर किरण कोंडाबगील, प्रोफेसर रिंती बनर्जी, प्रोफेसर आशुतोष कुमार और प्रोफेसर शमिक सेन की टीम इस अनुसंधान पर निरंतर कार्य कर रही है। इस विशेषज्ञ टीम को विषाणु विज्ञान, संरचनात्मक बायोलॉजी, जैव भौतिकी, बायोमैटेरियल्स और दवा वितरण के क्षेत्र में गहरा अनुभव है। हालांकि इस तकनीक को पूरी तरह विकसित करने में लगभग 9 माह लग सकते हैं।

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