संसद में वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पर चर्चा
- दीप्ति शर्मा
संसद में वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और एआईएमआईएम ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया है। इसके पीछे कई संभावित कारण हैं।
धार्मिक स्वायत्तता पर चिंता
विपक्ष का कहना है कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है। वक्फ एक्ट 1995 के तहत वक्फ बोर्ड को स्वायत्तता थी, पर नए बदलाव जैसे गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना और कलेक्टर को सर्वे का अधिकार देना वे इसे ‘‘मुस्लिम अधिकारों पर हमला‘‘ मानते हैं।
सदन में हुई चर्चा में कांग्रेस सांसद नसीर हुसैन ने इसे ‘‘मस्जिद, दरगाह, और कब्रिस्तान छीनने वाला बिल‘‘ कहा, जो धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश दिखाता है। विपक्ष का दावा है कि यह संविधान की मूल भावना धर्मनिरपेक्षता और समानता के खिलाफ है। वे कहते हैं कि हिंदू या सिख संस्थाओं में गैर-सदस्यों को शामिल करने की बात नहीं होती, तो वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम क्यों? इसी तरह, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे ‘‘संविधान पर हमला‘‘ बताया, जो उनकी कानूनी आपत्ति को दर्शाता है।
वोट बैंक की राजनीति
मुस्लिम समुदाय भारत में करीब 20 करोड़ (14 %आबादी, जनसंख्या प्रोजेक्शन 2025) है, और विपक्ष इसे अपने पारंपरिक वोट बैंक के तौर पर देखता है। बिल का विरोध करके वे मुस्लिमों में यह संदेश देना चाहते हैं कि वे उनके हितों की रक्षा कर रहे हैं।
ममता बनर्जी और अखिलेश यादव ने इसे ‘‘मुस्लिम विरोधी‘‘ करार दिया, जो इस रणनीति को दिखाता है। खासकर यूपी, बंगाल, और बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ मुस्लिम वोट निर्णायक हैं। कांग्रेस, एसपी, टीएमसी व एआईएमआईएम आदि वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 को पूरी तरह समझे बिना, सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए विरोध कर रहा है।
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 में 40 बदलाव किये गये है। जैसे गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना, ‘‘वक्फ बाय यूजर‘‘ को हटाना, कलेक्टर को सर्वे का अधिकार और संपत्ति रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करना। सरकार का दावा है कि यह पारदर्शिता, महिलाओं के हक (दो महिला सदस्य) और भ्रष्टाचार रोकने के लिए है (जैसे कर्नाटक वक्फ स्कैम 2024)।
विपक्ष ने इसे ‘‘मुस्लिम विरोधी‘‘ और ‘‘जमीन हड़पने‘‘ का बिल कहा लेकिन उनके तर्क महज भावनात्मक हैं। जैैसे ‘‘संविधान पर हमला‘‘ या ‘‘मस्जिदें छीनी जाएँगी‘‘ न कि बिल की धाराओं पर कोई ठोस आपत्ति। जेपीसी में 44 संशोधन सुझाए गये, पर उनकी चर्चा सामान्य आरोपों तक सीमित रही। विपक्ष ने बिल की बारीकियों (जैसे डिजिटल रजिस्ट्रेशन से पारदर्शिता) पर कम फोकस किया और भावनाओं को भड़काने पर ज्यादा। मुस्लिम आबादी (20 करोड़, 14%) विपक्ष का पारंपरिक आधार है। खासकर यूपी (19%), बंगाल (27%), और बिहार (17%) में। बिल का विरोध करके वे मुस्लिमों में यह संदेश देना चाहते हैं कि वे उनके ‘‘रक्षक‘‘ हैं। अखिलेश यादव ने इसे ‘‘मुस्लिम अधिकारों पर हमला‘‘ कहा, जो वोट की अपील दिखाता है।
बीजेपी को घेरना
2024 में बीजेपी की 240 सीटें (एनडीए के साथ सरकार) दिखाती हैं कि विपक्ष को उसे कमजोर करने का मौका चाहिए। वक्फ बिल को ‘‘हिंदुत्व एजेंडा‘‘ से जोड़कर वे बीजेपी को कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं। विपक्ष ने इस बिल को रचनात्मक बहस की जगह ‘‘धर्म पर हमला‘‘ बनाकर पेश किया। ममता बनर्जी ने कहा, ‘‘यह मुस्लिमों को खत्म करेगा‘‘जो मात्र अतिशयोक्ति लगती है।
केंद्र सरकार का कहना है कि इस कानून से 9.4 लाख एकड़ वक्फ जमीन (₹1.2 लाख करोड़) का दुरुपयोग रुकेगा। जबकि विपक्ष इसका जवाब ‘‘जमीन हड़पने‘‘ से देता है, बिना विकल्प सुझाए। 2025 में, जब बिल फरवरी में जेपीसी रिपोर्ट के बाद अपै्रल में पास हुआ, विपक्ष इसे कोर्ट में चुनौती देने की बात कर रहा है। अर्थात् उनकी रणनीति 2027 में यूपी चुनाव और 2029 के आम चुनाव की ओर दिखती है। यह सच को समझने से ज्यादा वोट को पकड़ने की रणनीति है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)