Saturday, 15 August, 2026

स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के अकाट्य तथ्य – मुरलीधर

स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगाठ पर भारतीय जनकल्याण समिति, कोटा द्वारा सूरज भवन, बल्लभबाड़ी में भव्य समारोह
न्यूजवेव@ कोटा

स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगाठ पर भारतीय जनकल्याण समिति, कोटा द्वारा सूरज भवन, बल्लभबाड़ी में भव्य समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कोटा विभाग संघचालक पन्नालाल शर्मा ने की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चितौड़ प्रांत के प्रान्त प्रचारक मुरलीधर ने कहा कि भारतीय इतिहास को धूमिल करने के प्रयास अब और नहीं टिकेंगे। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किये।
मुख्य वक्ता मुरलीधर ने स्पष्ट किया कि भारत की आजादी बिना खड़ग-बिना ढाल से नहीं बल्कि क्रांतिकारियों के बलिदान और जनजन के संघर्षों का परिणाम है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक केशवराव हेडगेवार एवं तत्कालीन स्वयंसेवकों की टोली ने अपना सक्रिय योगदान दिया। जो विरोधी संघ पर आरोप लगाते हैं उनको “संघ और स्वतंत्रता आंदोलन” नामक पुस्तक पढ़नी चाहिए।


डॉ हेडगेवार ने 8 वर्ष की उम्र में ही रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती पर मिठाई को सबके सामने कूड़ेदान में फेंककर विदेशी दासता का प्रतिकार किया था। वे अपने शेष जीवन में स्वाधीनता संग्राम से दूर रहे ऐसा कैसे हो सकता है। 1907 में नीलसिटी हाई स्कूल से उनको इसलिए निष्कासित किया गया कि उन्होंने पिछले रिस्ले सर्कुलर के विरोध में पूरे स्कूल को वन्देमातरम् और भारत माता की जय से गूंजायमान कर दिया। कलकत्ता में क्रांतिकारियों की अनुशीलन समिति में उनकी सक्रिय भूमिका रही जहाँ उन्हें “कोकेन” छद्म नाम दिया गया।
डॉ हेडगेवार ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव का रखा
उन्होंने बताया कि 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में संयुक्त सचिव के पद का निर्वहन करते हुए पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित करने को सर्वप्रथम आग्रह डॉ. हेडगेवार ने किया जिसे कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने पारित नहीं किया, और यही प्रस्ताव कांग्रेस ने 1929 के लाहौर अधिवेशन में पारित किया। 1925 में क्रांतिकारी राजगुरु ने डॉ. हेडगेवार को पुणे नहीं आगे की सलाह दी। राजगुरु को पुणे आने पर गिरफ्तार किया गया और अंततः उन्हें फांसी दे दी गई।
डॉ. हेडगेवार के स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय रहने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि 1930 में 11 माह की जेल काटकर रिहा होते समय मोतीलाल नेहरू, हाकिम अजमल खां और राजगोपालाचार्य जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जेल के बाहर उनको लेने आये।
आजादी के लिये शहीद हुये कई स्वयंसेवक
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में 7 लोग गोली से शहीद हुए, उसमें से 2 लोग सक्रिय स्वयंसेवक थे। हेमू कालानी संघ के स्वयंसेवक थे जिनको 1943 में मौत की सजा दी गयी। 1947 में एक शाखा प्रमुख दादानाई को मौत की सजा मिली। एक शाखा प्रमुख रामदास की हत्या पुलिस की गोली से हुई। आंदोलनरत स्वयंसेवक बालाजी रामदास को अंग्रेज पुलिस ने गोली मारी।
मुरलीधर ने कहा कि विभाजन के समय हिंदुओं को पाकिस्तान से बचाकर भारत लाने की आंखों देखी बातें आज भी कोटा में वयोवृद्ध स्वयंसेवक लद्दाराम से सुनी जा सकती हैं। भारत विभाजन में हिंदुओं पर जो भीषण अत्याचार हुए उन्हें नई पीढ़ी से नहीं छिपाया जा सकता। देश की जनता ने स्वतंत्रता का क्या मूल्य चुकाया इस पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। 1947 में असंख्य कांग्रेस नेताओं को विस्थापन के पश्चात शरण देने वाले स्वयंसेवकों के नाम गिनाये जा सकते हैं, जिनका अरुणा आसफ अली जैसे कांग्रेस नेताओं ने सार्वजनिक रूप से आभार प्रकट किया। मुरलीधर ने आम नागरिकों से विकसित और अखंड भारत के लिए कर्तव्य निर्वहन करने का आग्रह किया।

समारोह में अखिल भारतीय सामाजिक सद्भाव कार्य के प्रमुख आ. बलिराम, विभाग संघचालक पन्नालाल, महानगर संघचालक गोपाल गर्ग, वयोवृद्ध प्रचारक राजेन्द्र द्विवेदी एवं कई गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

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