Tuesday, 20 October, 2020

हिमाचल प्रदेश के रोहतांग में अटल टनल का भव्य उद्घाटन 

अटलजी का सपना सिद्धि के रूप में साकार हुआ, करीब 3200 करोड़ रुपए लागत से बनी एतिहासिक टनल- पीएम

न्यूजवेव @ मनाली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल टनल का उद्घाटन करते हुये कहा कि आज का दिन ऐतिहासिक है। आज सिर्फ अटल जी का ही सपना नहीं पूरा हुआ है, आज हिमाचल प्रदेश के करोड़ों लोगों का भी दशकों पुराना इंतजार खत्‍म हुआ है। मैं यहां संगठन का काम देखता था, यहां के पहाड़ों, यहां कि वादियों में अपना बहुत ही उत्‍तम समय बिताता था और जब अटलजी मनाली में आकर रहते थे तो अक्‍सर उनके पास बैठना, गपशप करना।  मैं और धूमलजी एक दिन चाय पीते-पीते इस विषय को उनके सामने रख रहे थे। जैसा अटलजी की विशेषता थी, वो बड़े आंखें खोल करके हमें गहराई से पढ़ रहे थे कि हम क्‍या कह रहे हैं। वो मुंडी हिला देते थे कि हां भई। लेकिन आखिरकार जिस बात को लेकर मैं और धूमलजी उनसे लगे रहते थे वो सुझाव अटलजी का सपना बन गया ,संकल्‍प बन गया और आज हम उसे एक सिद्धि के रूप में अपनी आंखों के सामने देख रहे हैं।

कुछ मिनट पहले हम सबने एक मूवी भी देखी और मैंने वहां एक पिक्‍चर गैलरी भी देखी- The making of Atal Tunnel. अक्‍सर लोकार्पण की चकाचौंध में वो लोग कहीं पीछे रह जाते हैं जिनके परिश्रम से ये सब संभव हुआ है। अभेद्य पीर पांजाल उसको भेदकर एक बहुत कठिन संकल्‍प को आज पूरा किया गया है। इस महायज्ञ में अपना पसीना बहाने वाले, अपनी जान जोखिम में डालने वाले मेहनतकश जवानों को, इंजीनियरों को, सभी मजदूर भाई-बहनों को आज मैं आदरपूर्वक नमन करता हूं।

साथियों, अटल टनल हिमाचल प्रदेश के एक बड़े हिस्‍से के साथ-साथ नए केंद्र शासित प्रदेश लेह-लद्दाख की भी लाइफ लाइन बनने वाला है। अब सही मायनों में हिमाचल प्रदेश का ये बड़ा क्षेत्र और लेह-लद्दाख देश के बाकी हिस्‍सों से हमेशा जुड़े रहेंगे, प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ेंगे। इस टनल से मनाली और केलॉन्ग के बीच की दूरी 3-4 घंटे कम हो जाएगी। पहाड़ के मेरे भाई-बहन समझ सकते हैं कि पहाड़ पर 3-4 घंटे की दूरी कम होने का मतलब क्या होता है।

लेह-लद्दाख के किसानों, बागवानों, युवाओं के लिए भी अब देश की राजधानी दिल्‍ली और दूसरे बाजार तक उनकी पहुंच आसान हो जाएगी। उनका जोखिम भी कम हो जाएगा। यही नहीं, ये टनल देवधरा हिमाचल और बुद्ध परम्‍परा के उस जुड़ाव को भी सशक्‍त करने वाली है जो भारत से निकलकर आज पूरी दुनिया को नई राह, नई रोशनी दिखा रही है। इसके लिए हिमाचल और लेह-लद्दाख के सभी साथियों को बहुत-बहुत बधाई।

अटल टनल भारत के बॉर्डर infrastructure को भी नई ताकत देने वाली है। ये विश्‍वस्‍तरीय बॉर्डर connectivity का जीता-जागता प्रमाण है। हिमालय का ये हिस्‍सा हो, पश्चिम भारत में रेगिस्‍तान का विस्‍तार हो या फिर दक्षिण व पूर्वी भारत का तटीय इलाका, ये देश की सुरक्षा और समृद्धि, दोनों के बहुत बड़े संसाधन हैं। हमेशा से इन क्षेत्रों के संतुलित और सम्‍पूर्ण विकास को लेकर यहां के infrastructure को बेहतर बनाने की मांग उठती रही है। लेकिन लंबे समय तक हमारे यहां बॉर्डर से जुड़े infrastructure के प्रोजेक्ट या तो प्लानिंग की स्टेज से बाहर ही नहीं निकल पाए या जो निकले वो अटक गए, लटक गए, भटक गए। अटल टनल के साथ भी कभी-कभी तो कुछ ऐसा महसूस भी हुआ है।

साल 2002 में अटल जी ने इस टनल के लिए अप्रोच रोड का शिलान्यास किया था। अटल जी की सरकार जाने के बाद, जैसे इस काम को भी भुला दिया गया। हालत ये थी कि साल 2013-14 तक टनल के लिए सिर्फ 1300 मीटर यानी डेढ़ किलोमीटर से भी कम काम हो पाया था। एक्सपर्ट बताते हैं कि जिस रफ्तार से अटल टनल का काम उस समय हो रहा था, अगर उसी रफ्तार से काम चला होता तो ये सुरंग साल 2040 में शायद पूरी होती। जब विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ना हो, जब देश के लोगों के विकास की प्रबल इच्छा हो, तो रफ्तार बढ़ानी ही पड़ती है। अटल टनल के काम में भी 2014 के बाद, अभूतपूर्व तेजी लाई गई। बीआरओ के सामने आने वाली हर अड़चन को हल किया गया।नतीजा ये हुआ कि जहां हर साल पहले 300 मीटर सुरंग बन रही थी, उसकी गति बढ़कर 1400 मीटर प्रति वर्ष हो गई। सिर्फ 6 साल में हमने 26 साल का काम पूरा कर लिया।

बड़े प्रोजेक्‍ट के निर्माण में देरी से देश को नुकसान

Atal Tunnel

infrastructure के इतने अहम और बड़े प्रोजेक्‍ट के निर्माण में देरी से देश का हर तरह से नुकसान होता है। इससे लोगों को सुविधा मिलने में तो देरी होती ही है, इसका खामियाजा देश को आर्थिक स्‍तर पर उठाना पड़ता। साल 2005 में ये आकलन किया गया था, ये टनल लगभग 950 करोड़ रुपये में तैयार हो जाएगी लेकिन लगातार होती देरी के कारण आज ये तीन गुना से भी ज्‍यादा यानी करीब 3200 करोड़ रुपए से अधिक खर्च करने के बाद पूरी हो पाई है। कल्‍पना कीजिए कि अगर 20 साल और लग जाते तब क्‍या स्थिति होती।

connectivity का देश के विकास से सीधा संबंध होता है। ज्‍यादा से ज्‍यादा connectivity यानी उतना ही तेज विकास। खासकर बॉर्डर एरिया में तो connectivity सीधे-सीधे देश की रक्षा जरूरतों से जुड़ी होती है। लेकिन इसे लेकर जिस तरह की गंभीरता थी और उसकी गंभीरता की आवश्‍यकता थी, जिस तरह की राजनीतिक इच्‍छाशक्ति की जरूरत थी, दुर्भाग्‍य से वैसी दिखाई नहीं गई।

अटल टनल की तरह ही अनेक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स के साथ ऐसा ही व्यवहार किया गया। लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी के रूप में सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण एयर स्ट्रिप 40-50 साल तक बंद रही। क्या मजबूरी थी, क्या दबाव था, मैं इसके विस्तार में जाना चाहता हूं। सच्‍चाई यही है कि दौलत बेग ओल्डी की एयर स्ट्रिप वायुसेना के अपने इरादों की वजह से शुरू हो पाई, उसमें राजनीतिक इच्‍छाशक्ति कहीं नजर नहीं आई। दर्जनों प्रोजेक्‍ट जो सामरिक और सुविधा की दृष्टि से भले ही महत्‍वपूर्ण रहे हों, लेकिन वर्षों तक नजरअंदाज किए गए।

मैं करीब दो साल पहले अटल जी के जन्‍मदिन के अवसर पर असम में था। वहां पर भारत के सबसे लंबे रेल रोड ब्रिज ‘बॉगीबील पुल’ को देश को समर्पित करने का अवसर मुझे मिला था। ये पुल आज नॉ‍र्थ-ईस्‍ट और अरुणाचल प्रदेश से connectivity का बहुत बड़ा माध्‍यम है। बॉगीबील ब्रिज पर भी अटल जी की सरकार के समय ही काम शुरू हुआ था, लेकिन उनकी सरकार जाने के बाद फिर इस पुल का काम सुस्‍त हो गया। साल 2014 के बाद इस काम ने भी गति पकड़ी और चार साल के भीतर-भीतर इस पुल का काम पूरा कर दिया गया।

हिमालय क्षेत्र में दर्जनों प्रोजेक्ट पूरे किए 

अटल जी के साथ ही एक और पुल का नाम जुड़ा है-कोसी महासेतु का। बिहार में मिथिलांचल के दो हिस्सों को जोड़ने वाले कोसी महासेतु का शिलान्यास भी अटल जी ने ही किया था। लेकिन इसका काम भी उलझा रहा, अटका रहा। 2014 में हमारी सरकार आने के बाद हमने कोसी महासेतु का काम भी तेज करवाया। अब से कुछ दिन पहले ही कोसी महासेतु का भी लोकार्पण किया जा चुका है। देश के हर हिस्से में connectivity के बड़े प्रोजेक्ट्स का यही हाल रहा है। लेकिन अब ये स्थिति बदल रही है और बहुत तेजी के साथ बदल रही है। बीते 6 वर्षों में इस दिशा में अभूतपूर्व प्रयास किया गया है। विशेष रूप से Border Infrastructure के विकास के लिए पूरी ताकत लगा दी गई है। हिमालय क्षेत्र में, चाहे हिमाचल हो, जम्मू कश्मीर हो, कारगिल-लेह-लद्दाख हो, उत्तराखंड हो, सिक्किम हो, अरुणाचल प्रदेश हो, दर्जनों प्रोजेक्ट पूरे किए जा चुके हैं और अनेकों प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम चल रहा है। सड़क बनाने का काम हो, पुल बनाने का काम हो, सुरंग बनाने का काम हो, इतने बड़े स्तर पर देश में इन क्षेत्रों में पहले कभी काम नहीं हुआ।

इसका बहुत बड़ा लाभ सामान्य जनों के साथ ही हमारे फौजी भाई-बहनों को भी हो रहा है। सर्दी के मौसम में उन तक रसद पहुंचाना हो, उनकी रक्षा से जुड़ा साजो-सामान हो, वो आसानी से पेट्रोलिंग कर सकें, इसके लिए सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। देश की रक्षा जरूरतों, देश की रक्षा करने वालों की जरूरतों का ध्यान रखना, उनके हितों का ध्यान रखना हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है।

वन रैंक वन पेंशन को लेकर पहले की सरकारों का क्या बर्ताव था। चार दशकों तक हमारे पूर्व फौजी भाइयों को सिर्फ वायदे ही किए गए। कागजों में सिर्फ 500 करोड़ रुपए दिखाकर ये लोग कहते थे कि वन रैंक वन पेंशन लागू करेंगे। लेकिन किया फिर भी नहीं। आज वन रैंक-वन पेंशन का लाभ देश के लाखों पूर्व फौजियों को मिल रहा है। सिर्फ एरियर के तौर पर ही केंद्र सरकार ने लगभग 11 हजार करोड़ रुपए पूर्व फौजियों को दिए हैं।

एक लाख फौजी साथियों को लाभ मिला

हिमाचल प्रदेश के भी करीब-करीब एक लाख फौजी साथियों को इसका लाभ मिला है। हमारी सरकार के फैसले साक्षी हैं कि हमने जो फैसले किए वो हम लागू करके दिखाते हैं। देश हित से बड़ा, देश की रक्षा से बड़ा हमारे लिए और कुछ नहीं। लेकिन देश ने लंबे समय तक वो दौर भी देखा है जब देश के रक्षा हितों के साथ समझौता किया गया। देश की वायुसेना आधुनिक फाइटर प्लेन मांगती रही। वो लोग फाइल पर फाइल, कभी फाइल खोलते थे, कभी फाइल से खेलते थे।

गोला बारूद हो, आधुनिक रायफलें हों, बुलेटप्रूफ जैकेट्स हों, कड़ाके की ठंड में काम आने वाले उपकरण और अन्य सामान हों, सब कुछ ताक पर रख दिया गया था। एक समय था जब हमारी ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों की ताकत, अच्छे-अच्छों के होश उड़ा देती थी। लेकिन देश की आर्डिनेंस फैक्ट्रियों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया। देश में स्वदेशी लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों के लिए HAL जैसी विश्वस्तरीय संस्था बनाई गई, लेकिन उसे भी मजबूत करने पर उतना ध्यान नहीं दिया गया। बरसों तक सत्ता में बैठे लोगों के स्वार्थ ने हमारी सैन्य क्षमताओं को मजबूत होने से रोका है, उसका नुकसान किया है। जिस तेजस लड़ाकू विमान पर आज देश को गर्व है, उसे भी इन लोगों ने डिब्बे में बंद करने की तैयारी कर ली थी। ये थी इन लोगों की सच्चाई, ये है इन लोगों की सच्चाई।

हिमाचल का मुझ पर बहुत अधिकार है। आज समय बहुत कम होने के बावजूद हिमाचल के प्‍यार ने मुझ पर इतना दबाव डाल दिया, तीन कार्यक्रम बना दिए। मेरे सुझाव रक्षा मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और BRO के लिए हैं- एक ये टनल का काम अपने-आप में इंजीनियरिंग की दृष्टि से, वर्क कल्‍चर की दृष्टि से यूनिक है। पिछले इतने वर्षों में जबसे इसका डिजाइनिंग का काम शुरू हुआ, कागज पर लिखना शुरू हुआ; तब से लेकर अब तक। अगर 1000-1500 जगहें ऐसी छांटें, मजदूर भी हो सकता है और टॉप व्‍यक्ति भी हो सकते हैं। उसने जो काम किया है, उसका अपना जो अनुभव है उसको वो अपनी भाषा में लिखें। एक 1500 लोग पूरी कोशिश को अगर लिखेंगे, कब क्‍या हुआ, कैसे हुआ, एक ऐसा documentation होगा जिसमें human touch होगा। जब हो रहा था तब वो क्‍या सोचता था कभी तकलीफ आई तो उसको क्‍या लगा। एक अच्‍छा documentation, मैं academic documentation नहीं कह रहा, ये वो documentationहै जिसमें human touch है। जिसमें मजदूर काम करता होगा, कुछ दिन खाना नहीं पहुंचा होगा, कैसे काम किया होगा, उस बात का भी बड़ा महत्‍व होता है। कभी कोई सामान पहुंचने वाला होगा, बर्फ के कारण पहुंचा नहीं होगा, कैसे काम किया होगा।

कभी कोई इंजीनियर चैलेंज आया होगा, कैसे किया होगा। मैं चाहूंगा कि कम से कम 1500 लोग, हर स्‍तर पर काम करने वाले 5 पेज, 6 पेज, 10 पेज, अपना अनुभव लिखें। किसी एक व्‍यक्ति को जिम्‍मेदारी दीजिए फिर उसको थोड़ा ठीक-ठाक करके लैंग्वेज बेहतर करके documentation करा दीजिए और छापने की जरूरत नहीं है डिजिटल ही बना देंगे तो भी चलेगा।

Universities यहां केस स्‍टडी के लिए आएं

शिक्षा मंत्रालय से आग्रह है कि हमारे देश में जितने भी technical और इंजीनियरिंग से जुड़ी Universities हैं उन Universities के बच्‍चों को केस स्‍टडी का काम दिया जाए। और हर वर्ष एक-एक University से 8-10 बच्‍चों का बैच यहां आए, केस स्‍टडी की कैसे कल्‍पना हुई, कैसे बना, कैसे चुनौतियां आईं, कैसे रास्‍ते निकाले और दुनिया में सबसे ऊंची और सबसे लंबी जगह पर विश्‍व में नाम कमाने वाली इस टनल की Engineering knowledge हमारे देश के students को होनी ही चाहिए।

इतना ही नहीं, Globally भी मैं चाहूंगा MEA के लोग कुछ Universities को invite करें। वहां की Universities यहां केस स्‍टडी के लिए आएं। Project पर स्‍टडी करें। दुनिया के अंदर हमारी इस ताकत की पहचान होनी चाहिए। विश्‍व को हमारी ताकत का परिचय होना चाहिए। सीमित संसाधनों के बाद भी कैसे अद्भुत काम वर्तमान पीढ़ी के हमारे जवान कर सकते हैं इसका ज्ञान दुनिया को होना चाहिए। मैं चाहूंगा कि रक्षा मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, MEA, BRO, सब मिलकर एजुकेशन का हिस्‍सा बन जाए, टनल काम का। हमारी एक पूरी नई पीढ़ी इससे तैयार हो जाएगी तो Tunnel Infrastructure बनेगा लेकिन मनुष्‍य निर्माण भी एक बहुत बड़ा काम होता है। हमारे उत्‍तम इंजीनियर बनाने का काम भी ये टनल कर सकती है और उस दिशा में भी हम काम करें।

(Visited 148 times, 1 visits today)

Check Also

NEET-UG मे दो विद्यार्थियों ने 100 प्रतिशत अंकों से बनाया रिकॉर्ड

रिजल्ट: इस वर्ष 15.97 पंजीकृत में से 13.66 लाख ने दी परीक्षा जिसमें से कुल …

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: