Wednesday, 28 February, 2024

हार से डरो मत, जीत का यही है रास्ता- गौरांशी

24 वें डेफ ओलम्पिक में गोल्ड मेडल विजेता गौरांशी शर्मा का एलन ने किया सम्मान, 51 हजार का पुरस्कार एवं 10 ग्राम का गोल्ड मेडल देकर किया सम्मानित
न्यूजवेव @ कोटा
ब्राजील डेफ ओलम्पिक-2022 में गोल्ड मैडल जीतकर देश का नाम रोशन करने वाली रामगंजमंडी की गौरांशी शर्मा को एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट ने सम्मानित किया। एलन पीएनसीएफ द्वारा आयोजित मोटिवेशनल सत्र में बोलने-सुनने में अक्षम गौरांशी ने कहा कि हार से कभी डरना नहीं, बार-बार प्रयास करते रहो, जीत का यही मंत्र सफलता दिलाता है।


कोचिंग विद्यार्थियों से उसने कहा कि अपनी कमजोरी या परीक्षा में हार पर मायूस नहीं हों। एक हार के बाद दूसरी फिर तीसरी हार भी होगी। हो सकता है हार का सिलसिला लंबा चले लेकिन एक दिन आएगा, जब सफलता आपके कदम चूमेगी। मेरी सफलता में मेरे परिवार का बहुत बड़ा हाथ है। यदि परिवार का साथ नहीं मिलता तो आज ये मुकाम हासिल नहीं कर पाती। हम सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ सकते हैं। दो सत्रों में 5 हजार से अधिक विद्यार्थी गौरांशी का जज्बा देख बहुत प्रभावित हुये।


अभिनंदन समारोह में एलन निदेशक नवीन माहेश्वरी ने गौरांशी को 10 ग्राम का गोल्ड मेडल, पगड़ी व उपर्णा पहनाकर पहनाया, 51 हजार रूपए का चेक सौंपा। गौरांशी के संघर्ष में हिम्मत देने वाले उसके दादा-दादी प्रमोद व हेमलता शर्मा, माता-पिता गौरव व प्रीति शर्मा एवं ताऊ-ताई सौरभ व नीतू शर्मा का भी माला एवं उपरणा पहनाकर सम्मान किया गया।
माहेश्वरी ने कहा कि गौरांशी ने तिरंगें का मान दुनिया में बढ़ाया है। उसने कड़ी मेहनत कर देश के लिए गोल्ड मैडल जीता है। गौरांशी का बोल और सुन नहीं पाना लोगों को भावुक कर देता है, हर बच्चे को गौरांशी से प्रेरणा लेनी चाहिए, स्वयं को मजबूत करना चाहिए। संघर्ष से सफलता तक आगे बढ़ते रहना चाहिए। कार्यक्रम में एलन के वाइस प्रसीडेंट व पीएनसीएफ हेड अमित गुप्ता ने धन्यवाद जताया।
जब खौलते दूध से 50% शरीर जल गया था 
बोलने-सुनने में अक्षम गौरांशी की सफलता का सफर आसान नहीं रहा। उसके माता-पिता भी मूक-बधिर थे। माात्र दो साल की उम्र में उस पर खौलता हुआ दूध गिर गया था, जिसमें उसका 50 प्रतिशत शरीर जल गया था। इस हादसे के बाद पिता ने बेटी को सफलता की सीढ़ी चढ़ाने की ठान ली ताकि वह दूसरों के लिए मिसाल बन सके। माता-पिता बेटी को स्विमर बनाना चाहते थे। गौरांशी अच्छी तैराक बन गई थी लेकिन, स्विमिंग पूल से वापस लौटते समय उसी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में बैडमिंटन खेलते बच्चों को देखती थी। बैडमिंटन में रोल मॉडल साइना नेहवाल का फोटो देख इशारा करती थी कि मुझे यह खेलना है। फिर उसके पिता ने तय किया कि गौरांशी की इच्छा के अनुसार उसे बैडमिंटन सिखाएंगे।
साइना नेहवाल बनी रोल मॉडल
गौरांशी की सफलता में बैडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल की भूमिका अहम रही। एक मुलाकात के दौरान साइना ने गौरांशी को विशेष श्रेणी के नंबर-1 बैडमिंटन प्लेयर राजीव वक्कर के बारे में बताया और कहा कि अगली नंबर 1 प्लेयर तुम होंगी। इसके बाद गौरांशी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मात्र 7 साल की उम्र से बैडमिंटन खेल रही गौरांशी लक्ष्य के प्रति अडिग थी। बैडमिंटन में खुद को साबित करने के लिए रोजाना 8 घंटे की प्रैक्टिस, 20 किलोमीटर साइक्लिंग एवं 5 किलोमीटर की रनिंग करती थी।
गौरांशी ने जब बैडमिंटन खेलने का निर्णय लिया तो उसे काफी मुश्किलें आई। मूक-बधिर होने से कई कोचों ने उसे सिखाने से इंकार कर दिया। ऐसे में कोच रश्मि मालवीय व विष्णुवर्द्धन रेड्डी ने गौरांशी का हाथ थामा। उसका हर कदम पर साथ दिया, ताकि वो बैडमिंटन में खुद को साबित कर भारत का नाम दुनिया में रोशन कर सके, गौरांशी ने ऐसा कर दिखाया।

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