Saturday, 15 May, 2021

कोटा थर्मल की दो यूनिटें बंद करने की योजना जनता के साथ खिलवाड़- गुंजल

न्यूजवेव @ कोटा

कोटा उत्तर के पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल ने कहा कि कोटा सुपर थर्मल पावर स्टेशन की 1983-84 में स्थापित दो यूनिटें (यूनिट-1 व 2) 37 वर्ष बाद भी निरंतर 24 घंटे बिजली उत्पादन कर रही है। दोनों की उत्पादन क्षमता 110-110 मेगावाट है। लेकिन हाल ही में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और पर्यावरण मंत्रालय का गाइडलाइन का हवाला देकर राज्य विद्युत उत्पादन निगम ने दोनों यूनिटों को बंद करने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजकर कोटा की जनता के साथ खिलवाड़ किया है।

गुंजल ने कहा कि पुराने बिजलीघरों में एक यूनिट बिजली उत्पादन के लिये 700 ग्राम कोयले की जरूरत होती है और कोटा थर्मल की दो इकाइयों में यदि 750 ग्राम कोयले की खपत हो रही है तो इतनी सी मात्रा से यूनिटों को ही बंद करने की नौबत कैसे आ सकती है। आंकडों की बात करें तो कोटा थर्मल की पुरानी इकाइयांे पर अब कोई लोन या देनदारियां भी नहीं है, इनसे 3.93 रूपये प्रति यूनिट लागत में बिजली मिल रही है जिसे सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को 10 रूपये यूनिट में बेच रही है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार निजी क्षेत्र के बिजलीघरों एवं पडौसी राज्यों से भी महंगी दरों पर बिजली खरीदने पर बाध्य है। जनता को इस बात की जानकारी दी जाये कि अन्य राज्यों से प्रतिवर्ष कितने करोड़ की बिजली खरीदी जा रही है तथा निजी क्षेत्र से बिजली किस दर से ली जा रही है। इससे उर्जा खरीद समझौता (पीपीए) के तहत निजी क्षेत्र के पावर प्लांटों से महंगी दरों पर बिजली खरीदने का पर्दाफाश हो जायेगा।
उन्होने सवाल उठाया कि क्या प्रदेश की जनता को 3.93 रूपये प्रति यूनिट से सस्ती बिजली निजी क्षेत्र या अन्य प्रदेशों से मिल पा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, औरेया और दादरी के बिजलीघरों से क्रमशः 13.52 रू तथ 13.46 रूपये प्रति यूनिट से बिजली किस आधार पर खरीदी जा रही है। जबकि कोटा सुपर थर्मल की इकाइयों से 3.93 रूपये लागत की उत्पादित बिजली को महंगी बताया जा रहा है। जाहिर है, उर्जा खरीद समझौता की शर्तो में करोडों के भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है। इसकी शर्तें निजी क्षेत्र को लाभ पहुंचाने के लिये तय की जा रही है।
संकट मोचक है कोटा थर्मल
गुंजल ने कहा कि 2018 में छबडा, कालीसिंध तथा कोटा थर्मल के विनिवेश करने का पुरजोर विरोध करते हुये उन्होंने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया था। जब उन्हें जवाब मिला था कि कोटा थर्मल की यूनिटों को 2025 तक चलाने की पर्यावरणीय अनुमति दे दी गई है। कोटा उत्तर के उद्योग को बचाने के लिये उन्होंने थर्मल गेट पर धरना देकर अपनी ही सरकार से लडाई लडी थी। उस समय विपक्ष में शांति धारीवाल ने कहा था कि कांग्रेस सरकार बनी तो कोटा थर्मल की यूनिटों को कभी बंद नहीं होने दिया जायेगा। आज धारीवाल अपनी सरकार में मंत्री हैं, उनके क्षेत्र के उद्योग को बंद करने की तैयारी हो रही है लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव का विरोध करने का साहस तक नहीं किया है। आज भी छबडा, कालीसिंध या कवाई के बिजलीघरों में 660-660 मेगावाट की बडी इकाइयों में खराबी आते ही कोटा थर्मल की पुरानी यूनिटें संकट मोचक बनकर बिजली पैदा कर रही है। इनको स्थायी बंद कर देने से हाडौती की जनता को फिर से बिजली कटौती का सामना करना पडे़गा।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कांग्रेस सरकार ने कोटा थर्मल की पुरानी यूनिटों को बंद करने का निर्णय लिया तो इससे कोटा उत्तर के 10 हजार कर्मचारी व श्रमिक बेरोजगार हो जायेंगे। कोरोना महामारी के दौर में कोटा शहर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। पांच वर्ष में एक भी नया उद्योग नहीं खोलकर निरंतर बिजली पैदा कर रहे कोटा थर्मल को षडयंत्रपूर्वत बंद करने की योजना बनाई गई तो वे थर्मलकर्मियों, अभियंताओं, ठेका श्रमिकों तथा कोटा उत्तर की जनता के साथ सडकों पर जनांदोलन करेंगे। क्योंकि कोटा थर्मल की चार पुरानी इकाइयों को बंद करने से इस क्षेत्र में बेरोजगारी बढेगी, साथ ही छोटे-मोटे सभी कारोबार भी बंद हो जायेंगे।
निजी क्षेत्र से क्यों खरीद रहे महंगी बिजली
वर्ष 2017-18 के लिए आरवीयूएन के बिजलीघरों में प्रति यूनिट उत्पादन की अधिकतम लागत 4.58 रू तथा न्यूनतम लागत 3.11 रू निर्धारित की गई। जबकि निजी क्षेत्र के पॉवर प्लांट में अधिकतम लागत 4.06 से बढाकर 4.99 रू की गई है। ऐसे में सरकारी बिजलीघरों से सस्ती बिजली मिलने के बावजूद उन्हें बंद कर निजी क्षेत्र को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है। यदि निजी क्षेत्र को लाभ पहुंचाने का खेल बंद करके प्रति यूनिट बिजली दर का निर्धारण कुल लागत से किया जाए तो सरकारी पावर प्लांट को बंद करने की नौबत नहीं आयेगी।

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