Friday, 10 April, 2026

वीएमओयू के चतुर्थश्रेणी कर्मचारी को 30 वर्ष में नहीं मिली पदोन्नति

वीएमओयू ने हाईकोर्ट के आदेश नहीं माने तो माली समाज ने आंदोलन की चेतावनी दी

न्यूजवेव कोटा

माली समाज के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय प्रशासन से 30 वर्षों से हक की लडाई लड़ रहे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी चन्द्रप्रकाश सुमन को पदोन्नति देने की मांग की है।

गौरतलब है कि राजस्थान हाईकोर्ट ने 11 सितंबर,2018 को फैसले में स्थानीय कोर्ट के 9 जनवरी,2006 को कर्मचारी के पक्ष में दिये गए आदेश को यथावत रखते हुुए वीएमओयू को पदोन्नति के निर्देश जारी किये थे। इसके बावजूद वीएमओयू प्रशासन ने हाईकोर्ट के आदेश की आज तक पालना नहीं की।
सावित्री ज्योतिबा माली सैनी महासभा के संरक्षक भावेश चौहान, मंगलेश्वरी व्यायामशाला के अध्यक्ष नाथूलाल पहलवान, रामपुरा अखाड़ा छोटी समाध के उस्ताद बालकिशन बरथूनिया, पार्षद राकेश सुमन पुटरा, समिति अध्यक्ष बंशीलाल सुमन, देहात अध्यक्ष पूरण सुमन, माली धर्मरक्षक समिति अध्यक्ष चौथमल सुमन ने बताया कि पीड़ित कर्मचारी चन्द्रप्रकाश सुमन 30 वर्षों से वीएमओयू से अपनी पदोन्नति के लिये प्रशासनिक एवं कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिल रहा।
चंद्रप्रकाश के परिजन वीएमओयू के बाहर 9 दिन तक धरना दे चुके हैं। वीएमओयू प्रशासन ने कर्मचारी की तीनों जायज मांगें मानते हुए मौखिक समझौता किया था, लेकिन अब वीएमओयू इस समझौते से इंकार कर रहा है। नियमानुसार वीएमओयू चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी एवं हार्ट रोगी को गृह जिले से बाहर स्थानांतरित नहीं कर सकता लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन उसे उदयपुर ट्रांसफर कर प्रताडित कर रहा है।
द्वेषतापूर्ण निलंबित भी किया
कर्मचारी के परिजनों ने आरोप लगाया कि तत्कालीन कुलसचिव अशोक शर्मा द्वारा स्वयं के हस्ताक्षर से स्वयं का ही प्रमोशन कर लिया। 8 वर्षों में यूनिवर्सिटी से लाखों रूपयों का एरियर उठा लेने का मामला उजागर करने पर द्वेषतापूर्ण कर्मचारी चंद्रप्रकाश को निलंबित कर दिया गया। 26 माह में जांच होने के बाद कर्मचारी पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ तो कुलपति ने उसे बहाल कर दिया। जबकि उच्च न्यायालय के आदेशानुसार 6 माह में निलंबित कर्मचारी की जांच पूर्ण होनी थी, जिसकी अवमानना करते हुए 2 वर्ष तक जांच पूरी नहीं की गई। इससे वह 26 माह तक वेतन से भी वंचित रहे।
क्लर्क की जगह बना दिया चपरासी
कर्मचारी चन्द्रप्रकाश सुमन ने बताया कि 1989 में वीएमओयू में नियुक्ति के समय योग्यता को दरकिनार कर कनिष्ठ लिपिक के स्थान पर चतुर्थ श्रेणी के पद पर नियुक्ति दी। इसके पश्चात 12.7.1989 को बनी डीपीसी नियमों को भी दरकिनार कर मनमाने तरीके से 18ए अध्यादेश निकालकर उन्हें प्रमोशन से वंचित कर दिया। 22.6.1989 को राज्य सरकार द्वारा बनाए गए सेवा नियम के अनुसार 15 प्रतिशत प्रमोशन कोटा यूनिवर्सिटी में लागू नहीं किया गया, जबकि 14.6.1989 को पारित आदेश से 15 प्रतिशत कोटे में कुल 23 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को एकसाथ प्रमोशन दिया जा सकता था। 4.5.1996 को पैरा नंबर 125 ऑर्डर शीट के अनुसार वीएमओयू के तत्कालीन कुलसचिव एवं विधि सहायक द्वारा कर्मचारी के पक्ष में टिप्पणी की गई कि चन्द्रप्रकाश सुमन को पदोन्नति दिया जाना न्यायसंगत है।

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