Tuesday, 28 September, 2021

पत्रकारिता का विश्वविद्यालय थे – प्रभाष जोशी

राष्ट्रीय हिंदी दैनिक के ‘जनसत्ता‘ संस्थापक एवं प्रधान संपादक प्रभाषजी जोशी की  84वीं जन्मतिथी जयंती पर विशेष

15 जुलाई। आज पत्रकारों के प्रेरणा स्त्रोत पूज्य प्रभाष जोशी की 84वीं जन्मतिथी जयंती है। राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता‘ का बीजारोपण कर देखते ही देखते उसे वटवृक्ष बना देना उनका अद्भुत कौशल रहा। उनके इस कौशल से शायद ही कोई सुधी पत्रकार या पाठक नावाकिफ होगा। जनसत्ता उनकी गहन सोच समझ, अद्भुत परिकल्पना शक्ति, व्यवहारिक रणनीति और जन उन्मुख कार्यप्रणाली से रोज-रोज साक्षात्कार करवाता था। उनके नवाचारी नजरिए का दर्पण बन गया था जनसत्ता।  प्रभाषजी के सानिध्य में करीब 25 बरस जनसत्ता में काम करना हम जैसे कई पत्रकारों के जीवन में सबसे बड़ी पूंजी बन गया। उन्होंने हम जैसे पत्रकारिता के कई नवांकुरों को, अनगढ़ पत्थरों को तराश कर पत्रकारिता की माला में पिरोने लायक मोती बनाया। उनके साथ बिताया हर पल कुछ न कुछ नया और अच्छा सिखा जाता था। दरअसल वे अपने आप में पत्रकारिता का विश्वविद्यालय थे।
स्वतंत्र पत्रकारिता व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सार्थक करने के लिए उन्होंने जनसत्ता के लिए ‘‘ सब की खबर ले ,सब की खबर दे‘‘ जैसा नायाब ध्येय वाक्य तो दिया ही, उसे चरितार्थ भी कर दिखाया। जनसत्ता के संस्थापक एवं प्रधान संपादक के रूप में प्रभाषजी ने किसी ताकत की परवाह किए बिना, सच लिखने की जितनी बेमिसाल आजादी पत्रकारों को दी, उसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
जिन प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और विभिन्न दलों के प्रमुख राजनेताओं से प्रभाष जी का दोस्ताना रहा ,उनके खिलाफ लिखने की पूरी छूट उन्होंने अपने पत्रकारों को दी। उनके इस अभयदान की बदौलत जनसत्ता के कई संवाददाताओं ने कई खोजपूर्ण खबरें की जो काफी चर्चित हुई। पत्रकारिता के नाम पर कुछ भी गलत करने पर उन्होंने अपने खासमखास पत्रकारों की छुट्टी करने में भी देर नहीं लगाई। दूसरी ओर उन्होंने हर संकट के समय पत्रकारिता और पत्रकारों के अभिभावक व संरक्षक की भूमिका निभाई।
वही शब्द लिखो जो बोलने में काम लेते हो


प्रभाष जी ने हमें कठिन शब्दों के इस्तेमाल से बचना और सरल हिंदी लिखना सिखाया। तब पता चला कि कठिन हिंदी के मुकाबले सरल हिंदी लिखना कितना मुश्किल है। वे हमेशा आसानी से हर किसी की समझ में आने वाली बोलचाल की भाषा और छोटे-छोटे वाक्य लिखने पर जोर देते रहे। ‘‘वो शब्द मत लिखो जिन्हें आप बोलते नहीं, वही शब्द लिखो जो बोलने में काम लेते हों‘‘ प्रभाषजी के इस सूत्र वाक्य ने हिंदी पत्रकारिता की शब्दावली और उसका रूप विधान बदल दिया।
उन्होंने जनसत्ता को कभी बाजारू नहीं बनने दिया,बल्कि उसे हमेशा राष्ट्र व समाज का हित साधक बनाए रखा। जनसत्ता की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने पत्रकारिता के मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया और बीड़ी ,सिगरेट ,शराब आदि के विज्ञापन छापने की कभी अनुमति नहीं दी।
उन्होंने जनसत्ता के जरिए हिंदी पत्रकारिता को नए आयाम और नई ऊंचाई देने के लिए अनेक अनूठे प्रयोग किए जो सफल तो रहे ही, चिर स्मरणीय भी बन गए। वे अपने अखबार में अपना भाषण छपना भी पसंद नहीं करते थे, जबकि वे देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों में व्याख्यान देने के लिए जाते रहते थे .हमेशा कहते थे कि अखबार उसके मालिक या संपादक की नहीं,बल्कि जनता की संपत्ति होता है।
वे कितने कुशल वक्ता भी थे, इसकी बड़ी मिसाल नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट इंडिया (एन.यू.जे) भीलवाड़ा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में देखने को मिली। वहां प्रभाष जी ने अटलबिहारी वाजपेयी की मौजूदगी में वाजपेयी के मुकाबले बहुत उम्दा भाषण देकर सबको चौंका दिया।
हमने बहुत नजदीक से देखा-जाना और समझा कि प्रभाषजी कितने बिरले कलमकार और नायाब इंसान थे। उनमें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार और आदर्श मनुष्य के सभी गुण विद्यमान थे। वे सब के साथ जिस सहजता, सरलता, अपनत्व और परिवार भाव बरतते थे ,उसकी बदौलत जो भी उनके संपर्क में आया, वह उनका होकर रह गया। उनके सद्गुणों के चलते उनके प्रशंसकों और अनुयायियों की फेहरिस्त लगातार लंबी होती चली गई, जो उनके देह छोड़ने के 12 बरस बाद आज भी यथावत कायम है।
उनकी यायावरी थमी नही
हार्ट अटैक आने ,बाईपास सर्जरी होने और पेसमेकर लगने के बाद भी उनकी यायावरी थमी नहीं। वे सर्वहित में आजीवन ‘चरैवेति चरैवेति‘ मंत्र को सार्थक करते रहे। वे जनता ,शासन, प्रशासन आदि के विभिन्न वर्गों से लगातार रूबरू होते रहने के लिए देशभर के सबसे ज्यादा दौरे करने वाले संपादक थे। साथ ही देशी शब्दावली, लोक संस्कृति व शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता रहे। अपनी माटी की गंध जैसे उनकी रग रग में समाई हुई थी। खेलों पर, खासकर क्रिकेट पर तहे दिल से सरस लिखने वाला उनके जैसा जुनूनी संपादक शायद ही कोई और हुआ हो। देश के लोगों को सूचना का अधिकार दिलाने के लिए चले लंबे जन आंदोलन के भी वे झंडाबरदार रहे। जीवन और जगत से जुड़े तमाम अहम विषयों के खासे जानकार प्रभाष जी सचमुच के हरफनमौला पत्रकार थे। अपने आप में वे एक संस्था व महाग्रंथ थे। पत्रकारिता के लौह पुरुष स्व. रामनाथ गोयनका के दूत बनकर उन्होंने प्रमुख राष्ट्रीय समस्याओं के निवारण की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभाईं। देश के पत्रकार शिरोमणि बनकर भी वे हमेशा आम आदमी बने रहे। काश ,राष्ट्र व समाज के हित में,सार्वजनिक जीवन में बहुआयामी भूमिका निभाने की प्रभाष जी की पत्रकारीय परंपरा आगे बढ़ पातीं।

– आत्मदीप, पूर्व राज्य सूचना आयुक्त, मध्यप्रदेश

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