Monday, 2 February, 2026

राजस्थानी मसालों से बढ़ रहा विदेशी खाने का जायका

न्यूजवेव, जयपुर

राजस्थानी मसालों की मांग विदेशों में अब बढ़ने लगी है। खाने में तड़का लगाने वाले मसालों के साथ ही औषधीय मसालों का उत्पादन राज्य में हो रहा है। ऐसे में अब औषधीय गुणों से भरपूर सुवा यानि ड्रिल सीड को राज्य की मसाला निर्यात योजना में शामिल करने की तैयारी की जा रही है। सुवा की विदेशों में जबर्दस्त मांग है। सुवा के बीजों से निकाले गए वाष्पशील तेल का प्रयोग कई तरह की दवाओं के निर्माण में किया जा रहा है। ऐसे में अब सुवा को राज्य की मसाला निर्यात योजना में शामिल किए जाने का प्रस्ताव कृषि विपणन बोर्ड ने भेजा है।

आपको बता दें कि विदेशों में मसाला निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने राजस्थान मसाला निर्यात प्रोत्साहन योजना 2015 में शुरू की थी। यह योजना की अवधि 31 मार्च को पूरा हो रही है। ऐसे में इस योजना को मार्च 2019 तक बढ़ाने की तैयारी भी की जा रही है। आपको बता दें कि राज्य में उपजे जीरा, सौंफ, मेंथी, अजवायन, लालमिर्च, हल्दी, राई, लहसून, कलौंजी का विदेशों में निर्यात किया जा रहा है। योजना के तहत निर्यातकों को सरकार अनुदान भी देती है। वर्ष 2016—17 में 302 मीट्रिक टन और 2017—18 में फरवरी तक 4109 मीट्रिक टन मसालों का निर्यात राजस्थान से विदेशों में किया जा चुका है।

यह है सरकारी योजना
राजस्थान मसाला निर्यात प्रोत्साहन योजना के तहत किसान या मंडी से मसाले खरीद कर निर्यात करने पर किसानों को सतही और समुद्री भाड़े पर अधिकतम 10 लाख रुपए प्रति निर्यातक प्रतिवर्ष 3 साल तक अनुदान मिलता है। राज्य से 2016—17 में निर्यात किए गए मसालों पर 2 लाख 04 हजार रुपए से अधिक का अनुदान दिया गया। जबकि 2017—18 में फरवरी तक 4109 मीट्रिक टन मसालों के निर्यात पर 13 लाख 89 हजार रुपए से अधिक के अनुदान का भुगतान किया जा चुका है। जिन देशों में समुद्री मार्ग से निर्यात नहीं हो उनमें ट्रक, रेल से सीधे निर्यात करने पर अनुदान देय होगा।

अब ड्रिल सीड होगा शामिल
जानकारों का कहना है कि सुवा के तेल में पानी मिलाकर डिल वाटर बनाया जाता है जो छोटे बच्चों को अफरा, पेट दर्द तथा हिचकी जैसी परिस्थितयो में दिया जाता है। सुवा के बीजो से निकाले गये वाष्पशील तेल को ग्राइप वाटर बनाने में भी प्रयोग किया जाता है। सुवा खाद्य के रूप में इसके साबुत या पीसे हुए बीज सूप, सलाद, सॉस और अचार में डाले जाते हैं। सुवा के हरे एवं मुलायम तने, पत्तिया, पुष्पक्रम भी सूप को सुवासित करने में प्रयोग होता है। राजस्थान के प्रतापगढ़ में प्रमुख रूप से आैषधीय फसल सुवा की खेती हाेती है।

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