Sunday, 11 January, 2026

भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोपरि है – सोमनाथ मंदिर

जब समुद्र की लहरें सोमनाथ के चरणों को पखारती हैं, तो भक्त को अनंत काल से चली आ रही शिव की शक्ति का अनुभव होता है

– वी.पी.पारीक
न्यूजवेव। सोमनाथ मंदिर केवल एक संरचना नहीं, बल्कि सनातन धर्म के पुनरुत्थान और अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। ‘सोम‘ अर्थात् चंद्रमा के स्वामी भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोपरि माना जाता है।


आज से ठीक हजार साल पहले गजनवी के सुल्तान महमूद ने सोमनाथ पर आक्रमण किया था। तीन दिन के कडे़ संघर्ष के बाद 11 जनवरी,1026 को मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। एम साल में कई हमलावरों ने इसे खंडित करने का दुस्साहस किया लेकिन वे भारतीय चेतना को खत्म नहीं कर पाये। लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 75 वर्ष पूर्व इस गौरवशाली मंदिर का पुनरूद्वार किया। आज सोमनाथ स्वाभिमान पर्व हमें उसे संघर्ष और विजय की याद दिलाता है।
1. वेदों और पुराणों में स्थान
सोमनाथ का उल्लेख ऋग्वेद, स्कंद पुराण और शिव पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। ऋग्वेद के अनुसार, इस स्थान पर ‘सोम‘ (चंद्रमा) ने भगवान शिव की आराधना की थी। स्कंद पुराण के ‘प्रभास खंड‘ में इस क्षेत्र की महिमा बताते हुए इसे ‘प्रभास क्षेत्र‘ कहा गया है, जो सभी पापों का नाश करने वाला और मोक्ष प्रदायक है।
2. पौराणिक कथा और चंद्रमा का शाप
पौराणिक कथा के अनुसार, चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की २७ पुत्रियों (नक्षत्रों) से हुआ था। चंद्रमा केवल रोहिणी से अत्यधिक प्रेम करते थे, जिससे अन्य पत्नियाँ दुखी हुईं। दक्ष के शाप के कारण चंद्रमा का तेज क्षीण होने लगा (वे क्षय रोग से ग्रसित हो गए)। तब ब्रह्माजी की सलाह पर चंद्रमा ने इसी सरस्वती-समुद्र संगम पर ‘महामृत्युंजय मंत्र‘ का जाप किया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें पुनर्जीवन और अमरता का वरदान दिया। इसी कारण यहाँ शिव ‘सोमनाथ‘ (चंद्रमा के स्वामी) कहलाए।
3. द्वादश ज्योतिर्लिंगों में स्थान और महत्व
शिव पुराण के अनुसार, सोमनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम है। ‘‘सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम…‘‘ इसका आध्यात्मिक महत्व इस बात से है कि यह ‘त्रिवेणी संगम‘ (कपिला, हिरण और सरस्वती नदियों का मिलन) पर स्थित है। यहाँ ज्योतिर्लिंग की पूजा करने से भक्त के जीवन का अंधकार मिटता है और उसे आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
4. ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव और जीर्णोद्धार
सोमनाथ का इतिहास संघर्ष और विजय की अद्भुत गाथा है। इसे कई बार विदेशी आक्रांताओं (महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी, औरंगजेब) द्वारा नष्ट किया गया, लेकिन हर बार यह अपनी राख से पुनः उठ खड़ा हुआ। प्राचीन मान्यता है कि पहला मंदिर चंद्रमा ने सोने का, रावण ने चांदी का और श्री कृष्ण ने चंदन की लकड़ी का बनवाया था। वर्तमान मंदिर का निर्माण भारत की स्वतंत्रता के पश्चात लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प से हुआ। इसका प्राण-प्रतिष्ठा समारोह 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों संपन्न हुआ।
5. आध्यात्मिक विवेचन और दर्शन
सोमनाथ मंदिर ‘कैलाश महामेरु प्रासाद‘ शैली में बना है। इसके शिखर पर स्थित ध्वज और कलश धर्म की विजय की घोषणा करते हैं। मंदिर के दक्षिण में स्थित ‘बाण स्तंभ‘ एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक चमत्कार है। इस पर लिखा है कि यहाँ से दक्षिण ध्रुव (South Pole) तक समुद्र के बीच में कोई भी भूखंड ( Landmass) नहीं है, जो प्राचीन भारतीयों के भूगोल और समुद्र विज्ञान के गहन ज्ञान को दर्शाता है।

सोमनाथ मंदिर हमें सिखाता है कि सत्य और आस्था को कभी मिटाया नहीं जा सकता। यह विनाश पर सृजन की जीत का प्रतीक है। आज भी जब समुद्र की लहरें सोमनाथ के चरणों को पखारती हैं, तो भक्त को अनंत काल से चली आ रही शिव की शक्ति का अनुभव होता है।

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