Saturday, 15 May, 2021

आस्था-अनुष्ठान की सिद्धपीठ-श्रीफलौदी माता मंदिर

विश्वप्रसिद्ध मंदिर – खैराबादधाम पर्व और परम्परा की धरा है, सामाजिक एकता, धार्मिक सद्भाव एवं मेलजोल की विरासत होने से यहां पग-पग पर श्रद्धाभाव उमड़ता है।
कोटा/खैराबाद। अखिल भारतीय मेडतवाल (वैश्य) समाज की आराध्य देवी हैं-श्रीफलौदी माताजी महाराज। देश में कुलदेवी का इकलौता मंदिर होने से श्रद्धालु इसे तीर्थस्थल खैराबादधाम के नाम से पुकारते हैं। सामाजिक एकता, धार्मिक सद्भाव एवं मेलजोल की विरासत होने से यहां पग-पग पर श्रद्धाभाव उमड़ता है।
राजस्थान में कोटा से 70 किमी दूर रामगंजमंडी के पास खैराबाद में श्री फलौदी माताजी का अति प्राचीन विश्वप्रसिद्ध मंदिर है। श्रीफलौदी माताजी 14 राज्यों में बसे अ.भा. मेड़तवाल (वैश्य) समाज की आराध्य कुलदेवी हैं, इसलिए इसकी पौराणिक सिद्धपीठ के रूप में मान्यता है। बुजुर्गों के अनुसार, फलदायिनी मां फलौदी के श्रीचरणों में आने से हर वर्ग के श्रद्धालु की मन्नतें पूरी होती है।
दिव्य पौराणिक महत्व और पुष्टिमार्गीय परम्परा के अनुसार समाजबंधुओं द्वारा पुष्पाहार एवं सूखे पंचमेवे (नैवेद्य) के साथ पूजा-अर्चना, आरती, मंगलाभोग, राजभोग व सांध्य भोग तथा श्रगार व पोषाक सेवा की जाती है। समाज का यह इकलौता अष्टकोणीय देवी मंदिर विश्वभर में प्रसिद्ध है। गर्भगृह में सिंहासन पर श्रीफलौदी माताजी का अलौकिक स्वरूप विराजमान है।

अष्टकोणीय श्रीफलौदी माता मंदिर

गौतम मुनी का आश्रम भी यहां
1960 से मंदिर के गर्भगृह में अखंड ज्योति प्रज्जवलित है। मां फलौदी को दुर्गा की द्धितीय ब्रह्मचारिणी का रूप माना गया है। महाभारत काल में यहां पांडवों के आने का उल्लेख है। श्री गौतम मुनी का आश्रम भी यहां रहा। कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार, राजस्थान में जो 84 वणिक जातियां बताई गईं, उनमें 7वें नंबर पर मेड़तवाल माने जाते हैं। मान्यतानुसार, मेड़ता (नागौर) मेड़तवाल (महाजन) जाति का उद्गम स्थल है, जहां से श्रीफलौदी माताजी का पड़ाव पुष्कर होते हुए मोहना, गागरोन और अंत में खैराबाद में हुआ। 228 वर्ष पूर्व झालरापाटन के सेठ दलजी मनीराम ने एक भाट जाति के भूस्वामी से 2 बीघा जमीन खरीदकर खैराबाद में समाज के सहयोग से श्री फलौदी माताजी मंदिर का स्थायी निर्माण कराया।
पवित्र जलकुंड

प्राचीन जलकुंड है, जिसके जल से त्वचा रोग मुक्त होते हैं

इस ऐतिहासिक स्थल पर देश के सभी राज्यों से विभिन्न जाति-वर्ग के श्रद्धालु वर्षपर्यंत दर्शन करने आते हैं। रोज सुबह-शाम मंदिर में मंगलाभोग, राजभोग सामूहिक संगीतमय आरती करते हैं। माता का सही नाम ‘फलदायिनी’ (अन्नपूर्णा) था जो कालांतर में फलौदी माताजी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंदिर के गर्भगृह में सोने, चांदी व कांच की सुन्दर व दैदीप्यमान कारीगरी व चित्रांकन दर्शनीय है। गुम्बदों पर अनूठी वास्तुकला है। मंदिर प्रांगण में एक प्राचीन जलकुंड (बावड़ी) है, जिसके जल से पाचन संबंधी रोग के साथ-साथ त्वचा रोग भी मुक्त होते हैं। 1992 में जयपुर में विश्व हिंदु परिषद द्वारा आयोजित अश्वमेघ यज्ञ में श्री फलौदी जलकुंड से जल मंगाया गया।
पंचायत परम्परा से एकजुटता
मंदिर में प्राचीन परम्परानुसार दरीखाना है। मेड़तवाल (वैश्य) समाज पारम्परिक पंचायत व्यवस्था से संचालित है। प्रत्येक नगर में समाज की पंचायत है तथा महापंचायत के रूप में दरीखाना की गरिमा है। दरीखाने में बैठक व्यवस्था (जाजम) गादी-तकियों की है, जिसमें समाज के अध्यक्ष व महामंत्री बैठते हैं। यहां से जारी दिशा-निर्देशों का पूरा समाज अनुशासित ढंग से अनुपालन करता है। एक माला के रूप में सामाजिक बंधन की यह परम्परा अतुलनीय है। मंदिर में एक प्राचीन शिलालेख के अनुसार, संवत् 1848 (1792 ईस्वी) में मंदिर की स्थापना के समय समाज के 52 गोत्रों की ओर से सेठ दलजी मनीराम द्वारा पहला डोरा फेरा गया (जीर्णोद्धार हुआ), यहां से श्रीफलौदी माताजी के द्वादशवर्षीय मेले की शुरूआत हुई।

वसुधैव कुटुम्बकम की जीवंत मिसाल

अध्यक्ष सेठ श्री माणकचंद आचोलिया, महामंत्री श्री गोपाल चंद्र गुप्ता (बारवां वाले) ,उपाध्यक्ष श्री घनश्याम मोड़ीवाल, श्री डीसी करोडि़या व कोषाध्यक्ष श्री कैलाश चंद्र दलाल ने बताया कि प्रत्येक 12 वर्ष में खैराबादधाम में पांचवे कुम्भ के रूप में श्री फलौदी द्वादशवर्षीय मेला आयोजित होता है। यह मेला उज्जैन सिंहस्थ के बाद आने वाली बसंत पंचमी पर भरता है। 28 जनवरी से 4 फरवरी,2017 तक इस तीर्थस्थल पर ऐतिहासिक श्रीफलौदी द्वादशवर्षीय कुंभ मेला सम्पन्न हुआ, जिसमें देश-विदेश से 1 लाख से अधिक श्रद्धालु 7 दिन श्रीफलौदी नगर के अस्थायी टेंटों में संयुक्त परिवार के बीच रहे। इस सामाजिक महासंगम में बच्चे, युवा, महिलाएं, पुरूष तथा बुजुर्ग साथ होने से वसुधैव कुटुम्बकम की जीवंत मिसाल देखने को मिली, जिसमें चार पीढि़यों के समाजबंधु एक-दूजे से गले मिले।

परम्पराओं की पावन तीर्थ नगरी 

ऐतिहासिक स्थल पर देश के सभी राज्यों से विभिन्न जाति-वर्ग के श्रद्धालु वर्षपर्यंत दर्शन करने आते हैं

श्री फलौदी माता के प्राकट्य पर्व के रूप में यहां प्रतिवर्ष जनवरी-फरवरी में विराट बसंत पंचमी महोत्सव मनाया जाता है। जिसमें देशभर से 25 हजार से अधिक समाजबंघु व श्रद्धालु धवल वस्त्रों में पारम्परिक पूजा-अर्चना करते हैं।
बसंत पंचमी के दिन माताजी गर्भगृह से बाहर पधारती हैं। समाज के हजारों पुरूष केसर व चंदन के उबटन से माताजी के चरणों में नमन करते हैं। महिलाएं केवल दर्शन करती हैं। इसी दिन विशाल भंडारे का आयोजन होता है।
दीपावली पर गोपाष्टमी के दिन यहां भव्य अन्नकूट महोत्सव होता है, जिसमें 56 भोगों का महाप्रसाद माताजी को अर्पित किया जाता है। मथुरा और नाथद्वारा की तरह यह वैष्णव परम्परानुसार शुद्ध देसी घी से बनाया जाता है।
वर्ष में 8 बार विशेष तिथियों ( प्रत्येक चतुर्थी, अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा व अमावस्या) पर यहां पंचामृत से अभिषेक होता है। माताजी का अभिषेक कराने के लिए वर्षपर्यंत अग्रिम बुकिंग होती है। भक्तजन परिवार एवं रिश्तेदारों के साथ मंदिर में पावन अभिषेक करते हैं, दर्शनलाभ के पश्चात् भंडारे का आयोजन हेाता है।
52 गौत्रों में से शेष वर्तमान 33 गौत्रों का तीर्थस्थल होने से खैराबादधाम में सामूहिक विवाह, परिचय सम्मेलन, विवाह समारोह एवं नवरात्र महोत्सव के पवित्र आयोजन धूमधाम से होते हैं।
विगत 40 वर्षों से सभी समुदायों के रोगियों की निस्वार्थ सेवा के लिए यहां श्री फलौदी धर्मार्थ चिकित्सालय संचालित है।

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