Tuesday, 23 April, 2024

42 वर्ष से लापता विमंदित मुरलीधर को मिले परिजन

कोटा के ‘अपना घर आश्रम’ में  हुई परवरिश

न्यूजवेव कोटा
बनारस (उप्र) के निकट औराई जिले के सहसपुर कस्बे में रहने वाले मुरलीधर दुबे 42 वर्ष बाद अपने परिजनों से मिले तो उसे देख भाई शरदकांत सहित सभी रिश्तेदारों की आंखे भर आईं।
हुआ यूं कि 7 नवंबर को दीपावली के दिन लावारिस विमंदित मुरलीधर दुबे की सूचना मिलने पर उसे अपना घर आश्रम में परवरिश के लिये लाया गया।
कुछ दिनों पूर्व अपना घर आश्रम में उपचार व काउंसलिंग के दौरान मुरलीधर ने बताया कि वो उत्तरप्रदेश के औराई जिले के सहसपुर कस्बे रहने वाले है। बचपन में स्कूल में पढ़ाई के दौरान फेल हो जाने से घर से बिना बताए कहीं निकल गए थे। इसके बाद नर्सिंग स्टॉफ एवं काउंसलर ने औराई थाने में सम्पर्क साधकर पुलिस को 42 वर्ष पुरानी पूरी घटना बताते हुए परिजनों के नाम पते उपलब्ध कराकर मदद की गुहार की।
‘अपना घर’ के सेवाकार्य से प्रभावित होकर औराई पुलिस ने परिजनों की तलाश की और फोन पर सेवा साथी अब्दुल से मुरलीधर के परिजनों की बातचीत करवाई। परिजनों को जैसे ही पता चला कि मुरलीधर जीवित है तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उनके भाई शरद कांत अपने अन्य रिश्तेदारों के साथ कोटा पहुंचे जहां मुरलीधर को देखते ही सभी की आंखे भर आईं।
परिवारजनों ने संस्था के मनोज जैन आदिनाथ एवं देवेंद्र आचार्य से उनको साथ गांव ले जाने की इच्छा जताई जिस पर संस्था के पदाधिकारियों ने तत्काल आपसी बातचीत कर सहमति जताई। मनोज जैन ने बताया कि 7 नवम्बर को जब मुरलीधर को प्रवेश दिया गया था तब इनके सिर में चोट के अलावा तब ये न तो चलने फिरने में समर्थ थे न ही नाम पता बताने में समर्थ थे।
10वीं में फेल होने पर घर से लापता हुआ था

आज जब परिवारजन मिले तो मुरलीधर ने वर्ष 19977 की 4 दशकों पुरानी बातों को साझा करते हुये बताया कि 10वीं कक्षा में फेल हो गया था। मैंने घर पर ही कमरा बन्द करके आत्महत्या करने हेतु प्रयास किया किन्तु फिर सोचा कि मरने से अच्छा भाग जाता हूँ। रात्रि का फायदा उठाकर 100 रुपये लेकर घर से मुम्बई चला गया फिर दिल्ली और पंजाब में रहा और अंत में वर्ष 1987 में 10 साल भटकने के बाद कोटा आ गया। यह शहर मुझे रास आ गया। कभी कचौरी की दुकान तो कभी खलासी का काम किया। फुटकर मजदूरी करके पेट भरता रहा। इस बीच बीमारी का मुझे पता नही चला। कुछ महीनों पहले मैं अपना घर आश्रम आया और यहां की देखभाल से स्वस्थ हुआ और संस्था के प्रयास से मुझे मेरे परिवारजन मिल गए।
परिवार में 59 वर्षीय बड़े भाई शरदकांत जो उत्तरप्रदेश के पशुपालन विभाग में कार्यरत है उन्हें प्रभुजी मुरलीधर ने आंखों से पहचान लिया। जब मुरलीधर को पता चला कि लगभग 15 वर्ष पूर्व पिता का देहांत हो गया तो वो फफक पड़े किंतु बूढ़ी माँ से मिलने के अरमान को लेकर पटना कोटा ट्रैन से समस्त औपचारिकता पूर्ण कर मुरलीधर अपने परिवारजनों से साथ आखिर 42 वर्षों पश्चात घर के लिए रवाना हुए।

 

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